सहपुरवा(आपातकाल की क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित )
सहपुरवा के अंश
सहपुरवा 1978 में विन्ध्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. यह उपन्यास आपातकाल की क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित है.. सामान्य सी एक दलित महिला कैसे अपनी तथा गांव की सुरक्षा के लिए संघर्ष करती है और व्यवस्था से टकराती है...
इसका पुनर्प्रकाशन ई बुक के रूप में देश की मानी जानी साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा ने किया है...
यहां प्रस्तुत है सहपुरवा के अंश......
‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’
‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’
फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी...
‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा.
‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’
फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ...
‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भयल रहऽल. जोखुआ कहत रहऽल के बड़ा मजा आयल रहऽल, हं रे चलऽल जाई, काहे न चलऽल जाई’
तीन चार बार सुर्ती ठोंक ठाक कर बिफना ने सुर्ती वाली हाथ की गदोरी फेकुआ की तरफ बढ़ा दिया. फेकुआ बिफना की गदोरी में से सुर्ती निकाल ही रहा था कि गांव के माने जाने मुखिया रामभरोस आ गये. रामभरोस खेतों की निगरानी के लिए निकले थे. सुर्ती मुंह में डाल कर फेकुआ ने रामभरोस से पूछा.. वह उन्हें चिढ़ाना चाहता था. अब पहिले वाला जमाना नाहीं है कि मजूरों को हंका दिया और काम शुरू, चाहे जोतनी हो, लवनी या कुछ भी.
‘सरकार! आप कऽ जोतनी आजु नहिंनी होत का?’
‘नाहीं रे! आज एकउ सारे काम पर अइबय नहीं कइनऽ, कुल मजूरवय बउराय गयल हवं. असउं सारेन के पट्टा का मिलि गयल, सभन कऽ दिमाग सिकहरे चढ़ि गयल बा, जब देख तब कामय बन्द कइ देनऽ सऽ, कातिक कऽ महीना बा अउर जोतनी बन्द, खेतवा उखड़ जाई तऽ का होई?’
रामभरोस ने बिफना व फेकुआ को ही नहीं पूरी हरिजन बिरादरी को उलाहा. सोनभद्र में बहुत पहले से ही हल जोतने का काम हरिजन ही किया करते हैं, एक तरह से हल जोतने में वंशवाद, बाप, फिर बेटा और बेटे के बाद बेटा.
फेकुआ को अपनी बिरादरी के बारे में रामभरोस की बातें सुन कर बुरा लगा. उसने भी रामभरोस की बात में बात जोड़ा...
‘हं सरकार! ई हरिजन हरिजनै रहि जइहंय, ई बिरादरियय अइसन हवय, अपनै हथवैं हरवा काहे नाही जोत लेहीत आप लोगन, लतियाईं हरिजनेन के, बनी मजूरी भी बचि जाई, कुलि घरे में रहि जाई. फिर आपन काम अपने हाथे करहीं के चाही.’
रामभरोस काहे के लिए फेकुआ की बातें सह पाते? उन्हें बहुत बुरा लगा..... हालांकि फेकुआ की बात कोई ऐसी नहीं थी जिससे कोई नाराज हो पर रामभरोस तो रामभरोस थे....
‘ई सारे कऽ मन बढ़ गयल बा, अइसन बतियावऽता, हमैं जबाब देता’
कोई दूसरी जगह होती तो रामभरोस फेकुआ को लतियाना शुरू कर देते पर जगह सिवान की थी, जहां रामभरोस अकेले थे, सिवान में फेकुआ को मारते तो जाने का होता. अगर फेकुआ भी लपट जाता तो...
वे अप्रत्याशित डर के कारण चुप थे.
रामभरोस ने देखा कि फेकुआ शरीर से गठा हुआ है, उन्हें मालूम था कि फेकुआ रियाज मारता है. वैसे भी फेकुआ एक दो आदमी को निपटा सकता है, रामभरोस ने मुड़ कर उसका शरीर देखा और सहम गये. उन्हें निराशा हुई, फेकुआ की तरह गठे हुए शरीर का अपनी बिरादरी में एक भी लड़का नहीं,
‘साला जाने का खाता है, अरे! का खाता होगा, भात और सिलहट की तरकारी, बहुत हुआ तो नून रोटी.’
जाने का बोल गया साला! अब यही रह गया कि रामभरोस हल चलांए, उनके लड़के हल जोतें, ये साले राड़, रहकार फिर का करेंगे, गद्दी पर बैठेंगे. ठीक है, जमाना बदल रहा है पर एकर का मतलब? कउआ हंस हो जाएगा, बाघ घांस खाएगा.’
रामभरोस काहे हल जोतेंगे? उनके घर में काहे की कमी है, पूरा गांव उनका है, ठीक है जमीनदारी टूट गई पर उन्होंने आज भी तीन चार सौ बीघे जमीन कुŸो, बिल्लियों के नाम से करके बचा ही ली है. आलीशान बखरी है, जवान बेटा है जो बाहर के अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है, गांव के परधान हैं, कांग्रेसी हैं, बी.डी.ओ. से लेकर दारोगा तक जान पहचान है, जिले का कोई भी आला हाकिम जब भी इस तरफ आता है, उनकी बखरी की ओर आए बिना वापस नहीं लौटता. कौन नहीं जानता कि कलक्टर साहब भूमि आवंटन के सिलसिले में पिछले साल पूरे लहसन के साथ रामभरोस की बखरी पर आये थे. जोरदार दावत हुई थी. अधिकारी भी दावत का इन्तजाम देख कर दंग रह गये थे.
और यह फेकुआ!.....
रामभरोस से हल जोतने के लिए बोल रहा है. उसे नहीं पता कि रामभरोस ही ऐसे किसान हैं जिन पर सीलिंग का मुकदमा चल रहा है, उन्हीं की पुश्तैनी जमीन पर सहपुरवा ही नहीं कई गांव आबाद हैं. जमीनदारी न टूटी होती तो किसी को एक धूर भी जमीन नहीं मिली होती. वैसे भी कई तरह की बातें हैं जो रामभरोस को सरकार कहलवाती हैं, ऐसा कुछ केवल परंपराओं के कारण ही नहीं तमाम अन्य कारणों से भी है, जैसे इलाके में सबसे अधिक धनी मानी होना, सबसे अधिक जमीन और जोत वाला होना, अधिकारियों का उनकी बखरी पर रोज रोज की दावतें लेना, दबंग होना और हमेशा लठैतों से घिरे रहना, बात बात पर किसी को लतिया देना आदि आदि. यही सारी बातें रामभरोस को लोगों से सरकार कहलवाती हैं. रामभरोस उस समय कुछ बोलना नहीं चाहते थे पर भीतरी ऐंठन बिना खुले रह जाए, ऐसा नहीं होता, वे खुले...
‘का रे फेकुआ! आज कल रियाज मारत हए का? देखत हई कि तोरे देंही पर मांस ढेर चढ़ि गयल बा, दिमग तऽ नहिंनी खराब होत नऽ’
रामभरोस की अधपकी मूंछें और सुर्ख ऑखों ने मिल जुल कर उनकी ऐसी आकृति बनाई कि फेकुआ फक्क रह गया. उसके देह की ऐंठन एक ही घुड़की में खुल गई. फेकुआ को अपने कहे पर अफसोस होने लगा.
फेकुआ को मालूम था कि रामभरोस ने रामगढ़ अस्पताल के सामने रमदिनवा को बुरी तरह पीटा था, जो तीन चार दिन बाद बिना दवा दारू के मर गया था. दवाई कराता भी कौन, गांव में किसी की हैसियत ही नही थी जो रामभरोस द्वारा मरवाए गये आदमी की दवाई करवाये, और रमदिनवा को रामभरोस की बखरी से कुछ मिलना जुलना नहीं था, बखरी नाराज तो नाराज फिर किसकी हिम्मत जो एक कदम भी आगे बढ़ता. बेचारा रमदिनवा तड़प तड़प कर मर गया.
रमदिनवा ही क्यों बहुत सारे लोगों को रामभरोस ने खुद मारा पीटा है, या तो अपने लठैतों से मरवाया पिटवाया है. किसी को भी मरवाने पिटवाने के लिए रामभरोस का इशारा ही काफी है.
कुछ दिन पहले की ही तो बात है रमचेलवा का धान ही लवा ले गये, अपने खलिहान में दवां भी लिए, वह बेचारा हिम्मत जुटा कर थाने पर गया फिर भी रामभरोस का रोआं तक टेढ़ा नहीं हुआ. किसे नहीं मालूम कि रामभरोस जब जैसा चाहते हैं कर गुजरते हैं. परधान के चुनाव में शोभनाथ पंडित उनके खिलाफ खड़े क्या हो गये कि आफत आ गई, बेचारे का घर बार ही उजड़ गया, भाइयों में बटवारा हो गया, इतना ही नहीं रामभरोस के मन की जलन तब हल्की हुई जब शोभनाथ का खलिहान आग के हवाले हो गया. सारा अनाज जल कर भसम हो गया. पूरा गांव तमाशा देख रहा था और शोभनाथ का खलिहान जल रहा था.
गांव में कोई माई का लाल नहीं जो रामभरोस की मर्जी के खिलाफ उनके सामने ही नहीं पीठ पीछे भी बोल दे.
फेकुआ को पीछे का ख्याल कर पसीना छूटने लगा
‘सरकार हमसे गलती होय गयल, भला आप बड़हर अदमी, हर काहे जोतब, हमरे गलती पर धियान जीन देब सरकार!’
पास ही में बिफना भी था, वह भी रामभरोस से माफी मांगने लगा पर रामभरोस का माथा काहे ठंडा होता... वे गरम हो गये और भावी दुर्घटनाओं की तरफ इशारा करने लगे. समूचा लील जाने के तर्ज पर उन्होंने फेकुआ को देखा जबकि फेकुआ और बिफना दोनों सम्मिलित रूप से माफी मांग रहे थे.रामभरोस तो रामभरोस, समय को मुठ्ठी में बांध कर रखने वाले, उस समय कुछ नहीं बोले, रास्ता पकड़े और सीधे बखरी की ओर वापस हो लिए.
रामभरोस के लौट जाने के बाद बिफना फेकुआ को सीख देने लगा, वही सीख जिसे उसने बाप दादों से सीखा था. उसने सीखा था कि बड़ों से ऐंठ कर नहीं बोलना, बतियाना चाहिए. बिफना ने फेकुआ को डांटा...
‘तोय कुछ नाहीं बुझते, भला सरकार से अइसे बतियावल जाला, तोसे का मतलब, ऊ हल जोतंय चाहे न जोतंय, ओन्हय चलले हऽ पढ़ावै.’
फेकुआ का करता, उसे जो बोलना था बोल चुका था बोली और गोली वापस तो होती नहीं. अपराधी की तरह बिफना की खरी खोटी सुनता रहा बाद में उसने अपना गुस्सा बैलों पर उतारा. पैना पर पैना पीटे जा रहा था बैलों को, उसे लगता कि वह हल में जुते बैलों को नहीं रामभरोस को ही मार रहा है. सतघरिया होते ही दोनों ने हल जोतना बन्द कर दिया तथा घर की ओर वापस हो लिए.
घर बहुत दूर नहीं था, दोनों कुछ ही देर में घर पहुंच गये. अभी सूरज डूबा नहीं था सो हर तरफ उजाला था.
खेत पर हल जोतते समय जो कुछ हुआ था सारा कुछ बिफना ने फेकुआ के बाप औतार से बता दिया..
फिर तो औतार फेकुआ पर लाल लाल हो गये..
‘सरकार से अइसन बतियइले हऽ तूं, तोर ई मजाल. ई ससुरा इहय करबय करी. येे सारे के का मालूम कि सरकार कवन आदमी हवन. तनिक रियाज का मारै लगल पगलाय गयल बा. ई ससुरा कहऽला कि हमार माई अब नार न काटी, सउरी न कमाई, गाय गोरू कऽ गोबर न फेंकी, न खलियाई’
‘अरे! ससुर तोहके का मालूम एतना सब कइले पर तऽ सरकार रिसिअइलय रहऽ नऽ, जब जवन चाहनऽ तवनय करऽ न, अउर जौने दिन ई सब न होई तउने दिन जाने का हो जाई. केके मालूम बा कि का होई, कब घर फुंकाय जाई, कहां पीठ पर डंडा पड़य लागी, के जान सकऽला.’
औतार एक आम आदमी, गालियों की दुनिया में ही पैदा हुए, बात बात पर गाली, एक तरह से संबोधन ही गालियों का, किसिम किसिम की गालियां, गालियों के लिए हर वह पात्र है जो उनके अनुसार टेढ़ा चलता है पर रामभरोस जैसा दबंग नहीं, रामभरोस को तो वह कहीं छिप कर भी गाली नहीं दे सकते, उन्हें मालूम है कि दीवारों के भी कान होते हैं.
औतार को भूला नहीं है अब तक कि ये वही रामभरोस हैं जो बिना किसी गलती के उन्हें जवानी में खूब मारा पीटा था एक महीने तक दवा दारू करना पड़ा था और सुगिया की बात.... उसे कैसे भूला जा सकता है कि रामभरोस ने अपने लठैतों द्वारा उसे उठवा लिया था. नुची, चुथी, लुटी, सुगिया तीन दिन बाद घर वापस आई थी. सुगिया को घर से उठाए जाने की खबर सहपुरवा के सारे लोगों को थी, सभी कान में तेल डाले थे तथा अपनी ऑखें ढाप ली थीं. गूंगा रहने में ही भलाई है, कौन रामभरोस से झगड़ा मोल ले.
सहपुरवा के लोगों ने सुगिया के उठाए जाने की घटना को किसी दुर्घटना की तरह माना था फलस्वरूप इसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव किसी पर नहीं पड़ा. वैसे भी इस तरह की घटनाएं केवल सहपुरवा की ही नहीं थी बल्कि पूरे विजयगढ़ और जसौली की थीं.
गांव भर अच्छी तरह जानता था कि सुगिया जवान हो गई है, उसके देह के उतार चढ़ाव मनोरम लगने लगे हैं, सुगिया बोले बतियाए भले नहीं पर उसकी देह हमेशा बोलती और गुदगुदाती रहती है. हालत यह हो गई थी कि जवान लड़के अपनी दृढ़तायें नहीं रोक पाते थे, खासतौर से वे जवान लड़के जो सवर्ण होते थे. वे समझते थे कि सुगिया उनके लिए किसी सामग्री की तरह है जो उनके गांव की सार्वजनिक संपŸिा है.
सुगिया केवल उन लोगों के लिए ही नहीं उन लोगों के लिए भी मनोरम दीखती थी जिनकी बेटियां सुगिया की हमउम्र थीं. गोया सबकी नजर सांवली, पतली, इकहरी बदन वाली सुगिया पर थी और सुगिया थी कि अपनी देह के करतबों से अजान थी, उसे पता ही नहीं था कि वह किसी कुसंयोग का बेहूदा प्रस्ताव है.
रामभरोस भी सहपुरवा के ही थे वे सुगिया को अपने बिस्तरे पर देखना चाहते थे. गांव के दूसरे तो सुगिया को देख कर ही मनोरम पीते थे पर रामभरोस ने तो योजना ही बना लिया. वे चाहते थे कि किसी भी तरह से सुगिया को हासिल करना है, इस हासिल को वे प्यार मानते थेे, प्यार की उनकी अपनी परिभाषा थी. देखा भी गया है कि जिस किसी को उन्होने अपना बिस्तरा बनाया फिर कोई दूसरा उसे बिस्तरा नहीं बना पाया. अगर किसी ने बनाया भी तो रामभरोस ने उसकी तेरही कर दिया.
अपने तरीके के प्यार के कारण रामभरोस ने औतार को अपना असामी बनाया. पहले औतार शोभनाथ के असामी थे. असामी बना लेने के बाद कई तरह की अतिरिक्त सुविधांयें भी औतार को दीं. जैसे यही कि दो बीधे खेत की माफी रहेगी, लगान नहीं देना पड़ेगा, बीज बंेगा भी बखरी से मिलेगा.
रामभरोस जानते थे कि असामी होने के नाते रामभरोस का आना जाना बखरी पर रहेगा ही, उसके साथ सुगिया भी आती जाती रहेगी, ऐसा करने से ही सुगिया के करीब पहुंचा जा सकता है, मेल मिलाप का सिलसिला अगर एकबार शुरू हो गया फिर काहे खतम होगा.
हुआ भी यही, सुगिया अक्सर औतार के साथ बखरी में आने जाने लगी पर रामभरोस सुगिया के आस पास तक नहीं पहुंच पाये. सुगिया रामभरोस से भी चालाक निकली, वह खुद को बचा कर उनसे दूर रहती.
उस समय रामभरोस बाप नहीं बने थे. बखरी में केवल उनकी जवान औरत ही रहती थीं. रामभरोस के मां बाप कुछ साल पहले मर चुके थे. कोई भाई वाई नहीं था, रामभरोस बाप के अकेले वारिस थे. बखरी के एकांत का लाभ लेने के लिए रामभरोस ने एक बार सुगिया से छेड़ छाड़ की पर सब बेकार हो गया, रामभरोस की पत्नी तथा सुगिया के सबल प्रतिरोध के कारण, रामभरोस मन मसोस कर रह गये, करते भी क्या? उनकी पत्नी सुगिया के बचाव में रणचण्डी की तरह खड़ी हो गईं.
रामभरोस का गुस्सा पत्नी पर दिनों दिन बढ़ता चला गया, बेचारी को रोज रोज बेवजह पिटना पड़ता. उसके बाद रामभरोस अपने असफल प्रयत्न की प्रतिक्रिया में जीने लगे. हार मान कर रामभरोस ने दूसरे रास्ते का चुनाव किया.
रामभरोस के लिए दूसरा रास्ता आसान और आजमाया हुआ था, वह रास्ता खानदानी था. प्रलोभन देकर, औतार को असामी बना कर, अतिरिक्त मजदूरी देकर, फिर भी उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ, सुगिया को अपनी गोदी में देखना जैसे पहले सपना था, वह सपना जस के तस बना हुआ था.
आजमाए हुए खानदानी रास्ते पर चलते हुए रामभरोस ने एक दिन अपने दरबार के डण्डपेलुओं और लठैतों द्वारा सुगिया को उसके घर से ही उठवा लिया, ऐसा करना उनके लिए काफी लाभप्रद भी हुआ. दूसरे रास्ते के प्रयोग में कहीं कोई बाधा नहीं आये सो उन्होंने अपनी पत्नी को मॉ विन्ध्यवासिनी के पूजन के लिए विन्ध्याचल भेज दिया था, साथ में साले को भी लगा दिया.
यह अवसर रामभरोस के लिए आश्वस्ति दायक और मनोरम था, सुगिया उनके घर में थी, जहां ढेर सारा एकांत था और सुरक्षा भी खूब खूब थी. घर में एकांत ऐसा था कि कैसे सुगिया ने रामभरोस का माथा फोड़ दिया यह रामभरोस को पता ही नहीं चला, हाथ और देह को कई जगहों पर काट लिया फिर भी रामभरोस अपने लक्ष्य से एक रŸाी भी बांए दांए नहीं हुए. कुछ निशान तो आज भी रामभरोस के चेहरे पर उनके करतबों की कहानी के रूप में दीखते हैं.
दो दिन बाद सुगिया को रामभरोस ने उसके घर भिजवा दिया. औतार और उनकी पत्नी को अचरज नहीं हुआ क्योंकि इस तरह की घटनांए हरिजन बस्ती के लिए आम थीं, वह भी उस घर के लिए जवान बेटियां हों, गदराई और मांसल. भला हो रामभरोस का कि वे घर पर नहीं चढ़ आये, चढ़ भी आते और सुगिया को उसके घर से ही उठवा लेते तो क्या हो जाता? कोई उनका क्या बिगाड़ लेता, कौन उनका प्रतिरोध करता, मान लिया जाता कि ऐसा होता रहा है और आगे भी होता रहेगा. थाने जा कर रपट करना यह भी तो आसान नहीं, रपट हो भी जाती तो दारोगा गवाही मांगता, गवाही कौन देगा? कौन बोलेगा कि यह सब हमने देखा है फिर इतना ही थाने पर थोड़य होता, थाने पर तो रामभरोस से अधिक होता, थाना भी तो नामी और प्रतापी जगह है किसे नहीं मालूम कि प्रतापियों के ताप में बहुत आग होती है.
दो दिन बाद सुगिया अपने घर वापस आ गई या भेज दी गई यह रहस्य माफिक था. औतार तथा उनकी पत्नी को आश्चर्य नहीं हुआ. वे पहले से ही जानते थे कि सुगिया कहां होगी, वे डर रहे थे कहीं सुगिया की हत्या न कर दी जाए पर ऐसा नहीं हुआ सुगिया साबूत थी. हरिजन बस्ती के लिए यह आम बात थी वे जानते थे कि मालिक लोगों के लिए औरतों की देह अछूत नहीं होती, अछूत तो केवल मरद ही होते हैं.
सुगिया टूट चुकी थी, उसकी सारी चंचलता व अल्हड़ता समाप्त हो चुकी थी अब वह केवल एक देह भर थी जिसमें जीवन नाम की कोई चीज नहीं थी, जो संासें ले सकती थी, कराह सकती थी तथा किस्मत पर रो सकती थी. सुगिया का घर बड़ा नहीं था. घर की दीवारें माटी की थीं तथा उस पर दो छान्हें टिकी थीं. एक में औतार तथा उनकी पत्नी बैठी थीं जिसमें में वे अक्सर बैठा करते थे. दूसरे में सुगिया जा कर बैठ गयी. दिन बीतते गये, बीतते गये, सुगिया तोड़ दी गयी, औतार तोड़ दिए गये, पर बिरादरी नहीं टूटी. सुगिया के घर वापस आते ही बिरादरी का कानून औतार के माथे पर चढ़ बैठा. गवाही के नाम पर बिरादरी का कोई भी आदमी सामने नहीं आया, औतार ने अपने लोगों को टटोला और मालूम किया तो मालूम हुआ जो पहले से ही मालूम था कि उनकी बिरादरी के लोग थाने पर नहीं बोलेंगे कि रामभरोस ने सुगिया को उठवा लिया था और दो दिनों तक अपने घर में जबरन रखा था.
कोई भी गूं गा नहीं किया पर बिरादरी की पंचायत के फैसले के लिए सभी उतावले हो गये, हुक्का पानी बन्द करने की धमकी देने लगे. औतार को बतौर सजा भात, मांड़ देना सारा कुछ स्वीकार है पर उनका कहना था कि जिस बात की सजा उन्हें दी जा रही है उसे ही थाने पर चल कर बोलो कि सुगिया के साथ क्या और कैसे हुआ. भात माड़ ले रहे हो तो थाने पर चल कर बोलो नाहीं तो काहे के लिए भात माड़?
पूछने पर सभी ने नकार दिया था और सभी की गर्दनें जमीन ताकनें लगीं थीं, कोई आगे नहीं आया, कई कदम नहीं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया कोई.
औतार ने कहा भी कि हम भात माड़ देंगे, निश्चितरूप से देंगे पर जिस लिए भात माड़ लिया जा रहा है उसे थाने पर बोलो तभी, नहीं तो नहीं. औतार जानते थे कि भात माड़ नहीं देने पर उन्हें बिरादरी से निकाल दिया जाएगा, निकाल दिया जाए बिरादरी से फिर वे क्या हो जांएगे, हरिजन से भी कोई छोटी बिरादरी है का?
सुगिया दो दिनों तक घर से बाहर थी, कहां थी यह सभी को मालूम था पर कोई कहने बोलने वाला नहीं था. बिरादरी ने आसान रास्ता पकड़ा और सुगिया को दुश्चरित्र घोषित कर दिया, सुगिया का घर से बाहर होना ही काफी था और दूसरे सबूतों की जरूरत ही नहीं थी. क्योंकि सुगिया चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी कि उसके साथ रामभरोस ने बलात्कार किया, यही काफी था, बिरादरी का कोई भी यह नहीं देख रहा था कि रामभरोस ने गांव की लड़की के साथ बलात्कार क्यों किया? बिरादरी के सामने रामभरोस नहीं थे, केवल सुगिया थी और औतार थे, जिन्हें दण्डित किया जा सकता था, इतनी ताकत थी बिरादरी के पास पर रामभरोस को दण्डित करने की ताकत नहीं थी. औतार को सारा कुछ मालूम था कि बरादरी कितना पउंड़ सकती है? गांव के पंचायती लोग जाति की पंचायत न बुलायें संभव नहीं था. आनन फानन में पंचायत के सभी चौधरियों को सूचनांए भेज दी गईं. बिरादरी का सिपाही पंचायत की तैयारी में जुट गया. पंचायत तो जैसे तैयार बैठी थी कि पंचायत हो और हम सभी एक साथ जुटें. पंचायत के लोग निश्चित दिन पर जुट गये. यह एक ऐसा अवसर होता है जब हरिजनों में एकता ही नहीं अनुशासन भी दिखाई पड़ता है, नहीं तो काहे का अनुशासन, काहे की एकता, काहे का संगठन. पंचायत तो इस आश में जुटी है कि एक दिन भात माड़ कायदे से मिलेगा नहीं तो कौन किसे खिलाता है,
गांव के विशाल पीपर के पेड़ के नीचे पंचायत बैठ गई, यह वही पेड़ है जहां रामभरोस की शौर्यगाथा ने पहली बार दमन का हुंकार भरा था, उसके पहले तो केवल विजयगढ़ राजा के सजावल ही हुंकार भरा करते थे और लोगों को पकड़ कर बेगार कराने के लिए ले जाया करते थे. रियासतें खतम होने के बाद सजावल की तरह रामभरोस की हुकूमत पूरे गांव में हुंकार भरने लगी.
सुर्ती, तमाखू आदि लेकर पंचायत के चौधरीगण टाट पर आसीन हो गये. टाट पर बैठते ही वरिष्ठतम् चौधरी पुनवासी ने सुगिया को तलब किया पर सुगिया वहां नहीं थी, सिपाही कुछ ही देर में सुगिया को पकड़ कर ले आया फिर सुगिया को पंचायत में हाजिर करा दिया गया.
पुनवासी चौधरी ने सुगिया से साफ साफ पूछा, बिना लाग लपेट के...
‘तोहरे साथे का कइलन हंऽ रामरोस सरकार! साफ साफ बोलो’
सुगिया ने साफ साफ बता दिया. साफ साफ में साफ था कि रामभरोस अपराधी हैं, और उन्हें गांव से बाहर निकाल देना चाहिए पर पंचायत के लोग तो इस लिए एकत्र ही नहीं हुए थे उनका लक्ष्य तो केवल भात माड़ था न कि क्या हुआ था सुगिया के साथ यह जानना. औतार भरी पंचायत में रो रो कर रामभरोस की काली करतूत बताते रहे थे पर उनकी सुनता कौन?, दोषी उन्हें ही माना गया. औतार को एक दरी तथा भात माड़ की सजा कबूल करनी पड़ी. चौधरियों के इस अन्यायी फैसले की बिफना के बाप सुक्खू ने कड़ी आलोचना की...
‘अरे! चौधरी साहब! एमें सुगिया कऽ का दोष बा? ऊ कवन जुरूम कइ देलेस कि ओकरे बापे के आप लोगन सजाय देत हई, जुरूम तऽ रामभरोस कइनऽ, ओन्हइ सजाय देहीं, काहे सुगिया के? ओके बेचारी के तऽ जबरी घरे से उठाय के लेगयनऽ रामभरोस, गांयें में के नाहीं जानत ई बात, तब तऽ सब तमाशा देखऽत रहल, अब कइसन पंचाइत?’
पंचायत के वरिष्ठ चौधरी पुनवासी को सुक्खू पर गुस्सा आ गया, उन्हें पंचायत के मामलों में अक्सर गुस्सा आ ही जाया करता है, लोग जानते हैं कि पुनवासी चौधरी के लिए गुस्सा एक ऐसी चीज है जिसे वे हमेशा नाक पर धरे रहते हैं और जुबान पर वही सनातनी गालियां..
‘का बकते है रे सुखुआ! तुम नाहीं जानते है हमार बिरादरी को कानून, हमारे अनियाव को बड़का, बुड़का सभै मानते हैं कि हमार पंचायत साफ साफ अनियाव करती है. तुम्हारी यह मजाल कि तुम बिरादरी के कानून को नाहीं मानो, हम जो चाहेंगे वोही करेंगे. गांव में तो और भी लड़की लोग होते हैं उनको तो सरकार नाहीं पकड़ लिए. तुम का जानेगा, औतरवा साला ओनकर आदमी है, असामी है, सिरवही करता है, ये ही कारण सरकार ओके उठवा ले गये, जरूर कउनो लस पुस रहा होगा, सुगनी का सरकार से, एम्मे कउनो चाल है, जौन हम बूझ रहे हैं, एही कऽ कमाई औतरवा खाय रहा है, जब कमाई खाएगा सरकार की तब तो सरकार उठवा ले जांएगे ही नऽ’
सुक्खू को महसूस हुआ असामी का काम करना, हरवाही करना अपनी बहिन बेटी बेच देना है. ई का बक बक कर रहा है पुनवासी चौधरी.
सुक्खू औतार को जानते थे, सुगिया को जानते थे, सचाई जानते थे कि रामभरोस का का कर सकते हैं, सुघ्घर लड़की देख कर उसे हासिल करने के लिए कौन करम नाहीं कर सकते. सुक्खू ने एकबार अपनी ऑखों से देखा था. सुगिया जंगल से लकड़ी का बोझ लिए घर वापस आ रही थी, रामभरोस ने उसे वहीं कहीं देख लिया था फिर क्या था रामभरोस का पुरुषार्थ जाग उठा और उन्होंने सुगिया को पकड़ लिया, पकड़ छुड़ाकर किसी तरह से सुगिया भागी, पर कितना भागती, कहां जाती, सुनसान सिवान, एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, हर तरफ सन्नाटा और मरघटी खामोशी. सुगिया को दुबारा रामभरोस ने पकड़ लिया फिर तो वह उनकी पकड़ में थी, कसमसाती, छटपटाती, सुगिया रामभरोस को जानती थी, सुरक्षा मिल जाए कहीं से वह चिल्लाने लगी. संयोग था कि सुक्खू भी जंगल से लकड़ी का बोझ लिए वापस आ रहे थे. सुक्खू को सुगिया की चीख साफ सुनाई पड़ी, वे चीख की ओर दौड़े. चीख रहर के खेत में से आ रही थी पर वहां कोई दीख नहीं रहा था, वहां केवल आर्तनाक चीखें थीं जो साफ साफ किसी औरत की जान पड़ रही थीं. रामभरोस सुगिया को रहर के खेत के अन्तःपुर की ओर घसीटे जा रहे थे. सुक्खू ने देखा....
कि यह तो सुगिया है, औतार की बिटियवा, सुगिया हांफ रही थी हकर हकर, सांसें जहां थीं वहीं टंगी हुई थीं, टंगी हुई दूसरी चीजों की तरह. सुगिया रामभरोस की पकड़ में मछली की तरह छटपटा रही थी. सुक्खू ने लकड़ी का गट्ठर पहले ही उतार दिया था तथा उसी गट्ठर में से एक सीधी लकड़ी डंडा माफिक हाथ में ले लिया था यह मानकर कि इसकी जरूरत पड़ सकती है, उसकी जरूरत पड़ भी गई उसी लकड़ी से सुक्खू ने बिना आगा पीछे देखे रामभरोस को पीटना शरू कर दिया, इतना मारा कि उनका पलीदा निकल गया. किसी तरह तब जा कर सुगिया का कुंआरापन सुरक्षित रह सका.सुक्खू रामभरोस की असलियत जानते थे फिर काहे खामोश रहते...
‘चौधरी साहब का बक बक करत हवऽ, कुछ जनबो करऽल कि अइसहीं हवा में झारत हवऽ, हम तोहसे जानल चाहत हई कि सुगिया तोहार लड़की होत त का करतऽ. औतरवा रामभरोस के ईहां मेहनत, मजूरी करऽला तब रामभरोस ओके बनी मजूरी देनऽ, फोकट में नाहीं देतन. तूं औन्हय जानऽ चाहे जीन जानऽ हम ओन्हैं जानीला, आजु औतरवा के लड़की के संघे तऽ काल्हु तोहरे लड़की के संघे, तब जीन नरियाया.
सुक्खू ने बहुत खरी खोटी पुनवासी चौधरी को सुनाया. चौधरी को सुक्खूं की बातें बिरादरी के अनुशासन के प्रतिकूल जान पड़ीं. बिरादरी की इज्जत बचाने के लिए पुनवासी चौधरी ने सुक्खू को पेड़ से बांध कर पचास जूते मारने का आदेश दिया पुनवासी चौधरी के आदेश के अनुपालन में बिरादरी के सिपाही उठे पर वे उठे ही रह गये. पूरी बिरादरी पुनवासी के इस आक्रामक आदेश के खिलाफ थी. पंचायत में शोर उठा...
सुक्खू को अगर किसी ने मारा तो वह हमारे गांव से साबिक नाहीं लौटेगा, उसे मार मार कर भर्ता बना दिया जाएगा. फिर तो सारा मामला रफा दफा हो गया और सारी पंचायत सुगिया के अपराध पर केंद्रित हो गई. पुनवासी चौधरी को भी यही ठीक जान पड़ा उनसे सुक्खू से क्या लेना देना. मामला तो सुगिया का है जो पंचायत के सामने है. सुक्खू को पंचायत में घसीटने से सुगिया का मामला भी हल नहीं होगा जबकि उसे हर हाल में सजा देना है और औतार से भात, मांड़ और एक दरी लेना ही है., सुगिया के मामले की पंचायत शान्तिपूर्ण ढंग से निपट गई, उसमें हो हल्ला नहीं मचा. मचता भी नहीं, औतार ने बिरादरी को भात मांड़ देना स्वीकार कर लिया, वे इसके विपरीत कुछ कर भी नहीं सकते थे. झगड़ा करने से अच्छा है भात, मांड़ दे देना, सो उन्होंने भात, माड़ की सजा को स्वीकार कर लिया.
औतार जानते थे कि वे बिरादरी के बिपरीत जा नहीं सकते थे, जाते भी कहां, सुगिया का बियाह भी तो करना था और बियाह होगा बिरादरी में ही, बिरादरी के अलावा दूसरी जाति के लोग सुगिया से थौडै बियाह करेंगे, देहीं पर चाहे जेतना नाच कूद लें पर बियाह नाहीं. औतार केवल एक ही काम कर सकते थे, रामभरोस का काम छोड़ सकते थे और उन्होंने वैसा किया भी.
फेकुआ की उमर उस समय चार साल की थी. सुगिया के साथ क्या हुआ था इसकी जानकारी उसे सुन सुनाकर ही हुई थी, उसे तो केवल औतार ही जानते थे, उन्होंने उस संत्रास को भोगा था, जिया था, गांव भर की उलाहनाएं सुना था तथा रामभरोस के प्रकोपों को भी झेला था..
सुक्खू और औतार दोनों हरिजन हैं पर उनमें बिरादरी का बारीक फर्क भी है, सुक्खू उतरहा हरिजन हैं तो औतार बड़हरिया. माना जाता है कि उतरहा हरिजनों का राज रियासत से कोई सरोकार कभी नहीं रहा है और बड़हरिया का सदैव से रहा है, वे बिजयगढ़ में चन्देल राजाओं के आने के साथ ही आये थे. दोनों की दोस्ती बचपन से ही है क्योंकि हरिजन बस्ती में यही दोनों खानदान ऐसे हैं जो सहपुरवा में कई पीढ़ियों से आबाद हैं. दूसरे जो है वे सालाना इस गांव से उस गांव अपने डेरा तम्बू लगाते रहते हैं. गांव में बिरादरी के सभी बड़े बूढ़ों ने फेकुआ को भला बुरा कहा कि वह काहे के लिए रामभरोस से उलझ गया. उसे मालूम होना चाहिए कि रामभरोस सरकार हैं और उनके सामने सिर झुका कर रहना चाहिए.
फेकुआ हताश और निराश, सभी की बातें चुपचाप सुनता फिर भी नहीं समझ पाता कि उसने रामभरोस के साथ ऐसा क्या कर दिया या बोल दिया जो बुरा हो, क्या वह इतना भी नहीं बोल सकता? फेकुआ करता भी क्या? किसी तरह औतार का गुस्सा ठंडा हुआ, फेकुआ ने अपने मां बाप तथा दूसरे बड़े बूढों की चेतावनियों का बोझ लिए बिना सोए ही रात बिता लिया.
फेकुआ को अपनी गलती समझ में नहीं आ रही थी आखिकार उसने किया क्या? रामभरोस का क्या नुकसान हो गया, क्या उनकी इज्जत इतनी कमजोर तथा भुरभुर है कि उसके कहने से भरभरा गई? उसे रह रह कर बिफना पर गुस्सा आता, उसने रामभरोस से हुई बात चीत का हवाला उसके बाप से क्यों बता दिया अगर नहीं बताया होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती फिर काहे के लिए उसका बाप नाराज होता.
फेकुआ निपटान के लिए गांव से बाहर गया हुआ था, बिफना भी उधर ही गया था, उधर ही गांव के सभी लोग निपटान के लिए जाते भी हैं पोखरे की तरफ. बिफना को लौटता देकर फेकुआ उसका इन्तजार करने लगा. इन्तजार का गहन रिश्ता सुर्ती से है और वह सुर्ती मलने लगा तब तक बिफना आ गया.
‘का रे बिफना! ससुर तूं बड़ा काबिल बनऽल, बाबू से काहे बताय देले रे! कि रामभरोस से हम का कहले रहली, तोके ओनसे कहिकऽ का मिलल ससुर’
बिफना कुछ देर तक फेकुआ का चेहरा ही देखता रह गया, उसे लगा कि उसके कारण फेकुआ नाराज हो गया है और उस पर शक कर रहा है, उसने बहुत ही मुलायमियत से कहा...
‘देख फेकुआ ई सब तोंय का जनबे, केकरे से कइसे बोलल,बतियायल जाला, रामभरोस के बारे में कोई से जानि बूझि लेहे, फिर हमसे बतियाये.’
फेकुआ निर्बुद्धि नहीं था, वह भी रामभरोस के बारे में बहुत कुछ जानता था. कई काण्ड रामभरोस ने उसके सामने किया कराया था, जिन्हें उसने बहुत पास से घटते हुए देखा था. हालात समझते हुए उसने बिफना से प्रतिवाद नहीं किया बल्कि आगे क्या करना चाहिए उसके बारे में जनना चाहा. जो बीत चुका था बीत चुका था, उसे तो लौटना नहीं था. बिफना ने आश्वासनों के सहारे उसे समझाया बुझाया कि रामभरोस सहुरवा में सबसे नीच और खराब आदमी है,ं या यह कहो कि वे आदमी ही नहीं हैं. उनसे बेमतलब रार नहीं लेना चाहिए.फेकुआ आशंकाओं में घिर गया जाने का करें रामभरोस. दैनिक क्रिया से निवृŸा हो कर दोनों अपने अपने घर लौट आये. रात में जो भोजन बना था उसे फेकुआ की अइया ने उसके सामने परोस दिया. फेकुआ सहजता से खाने लगा नहीं तो वह ताजा भात ही खाना चाहता है नून और मर्चा की चटनी के साथ. यह मौका फेकुआ की अइया के लिए अच्छा था, उन्हांेने उसे समझाना शुरू किया....
‘बड़का अदमिन से तनिक नरम होइ के बोलल बतियावल जाला, तोंइ नाही जनते, बड़का अदमिन कऽ मन अउर दिमाग, दुन्नो जनमै से गरम रहऽला अइसने में एक के नरम तऽ दुसरका के गरम रहले कऽ फरक नाहीं पड़ऽत. दुनौ गरम रहिययं तऽ मारैपीट होई नऽ.’
फेकुआ की अइया इतना ही बोल पाई थीं कि उन्हें सुगिया की याद आ गई, सुगिया की ही नहीं उसके साथ घटी घटना की भी. रोना रोकना चाहा पर नहीं रोक पाईं, मड़हा के अन्दर भाग कर चली गईं. मां का बोलते बोलते रोना, बाप का डांटना सारा दृश्य फेकुआ को उलट पुलट गया, उसे लगा कि वह सिर के बल खड़ा है और धरती कांप रही है.
वह घर से पैना लेकर बाहर निकला, उसे सन्देह था कि आज जरूर कुछ न कुछ होगा, सभी लोग बेकार नहीं बोल रहे, रामभरोस करेंगे कुछ न कुछ. सामने से उसके मालिक चौथी गंवहा आ रहे थे जिनके यहां वह हरवाही करता था, फेकुआ को देखते ही गुस्से में डांटने लगे....
‘अबहीं कऽ तोहार बेला भयल हऽ ससुर, बिफना कब्बइ काम पर निकल गयल अउर तूं अबहीं कऽ जात हव हर जोतय, न बाप कऽ पता अउर न काम कऽ पता’
रामभरोस ने तो चौथी गवहां की तुलना में कुछ असंगत नहीं कहा था उसे लगा कि चौथी गवहां तो रामभरोस से भी आगे हैं. फेकुआ इन सभी बातों को आज से ही नहीं सुन रहा है, स्कूल जाने के तथा जब से उसने गाय गोरू की चरवही शुरू किया था तब से सुन रहा है. अभी दो ही साल तो हुए जब चौथी गंवहां ने उसे हरवाही पर लगाया. उसके बाप औतार ने कोले के रूप में दो बिगहे खेत की मांग की थी चौथी गवहां से, पर चौथी गवहां ने औतार की बात पर विचार नहीं किया एक तरह से नहीं माना.
चौथी गवहां ऐसे वैसे आदमी तो हैं नहीं, हिसाबी आदमी हैं, बातों का वजन तौल कर चलने वाले, उन्हें सोदा महंगा जान पड़ा. वे पहले बड़े जोतदारों की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करते थे, छोटी आमदनी थी, उसी में से बचाकर बाढ़ी डेढ़ा का कारोबार करने लगे, कारबार चल निकला. छाछठ का अकाल आते ही उनकी किस्मत चमक गई, बाढ़ी डेढ़ा के उनके कारोबार ने उन्हें फटाफट धनी बना दिया. अकाल के समय हर कोई उनके पास खाद्यान्न के लिए जाता और बाढ़ी डेढ़ा पर खाद्यान्न ले जाता, मान कर चलता कि एक का दो ही देना पड़ेगा नऽ, बालबुतरू कम से कम भूखे तो नहीं मरेंगे.
गांव में चौथी नाम से जाने जाने वाले चौथी, चौथी गवहां हो गये. हजारों रुपया बैंक में जमा हो गया, जमीन खरीद ली, पक्का मकान बनवा लिया, उनके घर में कितना गल्ला है किसी के लिए थाह लगाना भी मुश्किल. चौथी गवहां ने हिसाब लगा कर फेकुआ को अधारा पर रख लिया क्योंकि वह अकेला था, पत्नी होती तो पूरे पर रखते, अधारा पर नहीं फिर पूरा कोला भी देना पड़ता.
फेकुआ काम पर देर से आने का कारण चौथी गवहां को जरूर बताता पर कहीं शिष्टाचार में कोई कमी न रह जाए इसलिए महटिया गया. रामभरोस के नाराज होने का मतलब गाली गलौज, मारपीट आदि आदि और चौथी गवहां के नाराज होने का मतलब भूख प्यास, चूल्हा ही नहीं जल सकता, पेट में जाने का का दोड़ने कूदने लगे. बिफना हल जोत रहा था, फेकुआ की इन्तजारी में चौथी गवहां का लड़का बैलों को चरा रहा था कि फेकुआ आये और बैलों को नाधे. अपने बाप की तरह ही उसने भी फेकुआ को भला बुरा कहा. फेकुआ खामोश था तथा बैलों को नाध लेने के बाद सारा गुस्सा अपने थूथुन पर उतारने लगा यानि मन के भीतर हजारों किस्म की गालियां चौथी के लिए और उनके लड़के, दोनों के लिए.



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