सहपुरवा(आपातकाल की क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित )
सहपुरवा के अंश सहपुरवा 1978 में विन्ध्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. यह उपन्यास आपातकाल की क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित है.. सामान्य सी एक दलित महिला कैसे अपनी तथा गांव की सुरक्षा के लिए संघर्ष करती है और व्यवस्था से टकराती है... इसका पुनर्प्रकाशन ई बुक के रूप में देश की मानी जानी साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा ने किया है... यहां प्रस्तुत है सहपुरवा के अंश...... ‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’ ‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’ फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी... ‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा. ‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’ फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ... ‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भयल ...