अंतर गाथा बदलते मानकों का आइना




बदलते मानकों का आइना 
‘अन्तर्गाथा’
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास 

 अमरनाथ अजेय 

सृष्टि में जैसे जैसे बदलाव हो रहे हैं वैसे ही मानव सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक संरचना में भी दिनों दिन बदलाव होते दिख रहे हैं। मानव मूल्य व मान्यताएं तथा सिद्धान्त जो मानव निर्मित क्रियाकलाप हैं, वे भी सुविधाओं की परिधि में अपनी जमीन छोड़ कर भिन्न भिन्न आडबरों में रूपान्ताित होते जा रहे हैं। श्री रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘अन्तर्गाथा’ कुछ इन्हीं विसंगतियों पर प्रहार करता हुआ कथा का आकार लेता है। आदमी, आदमी न होकर मात्र अपनी परर्छाइं हो गया है। प्रस्तुत उपन्यास में कथाकार, कवि, ठेकेदार, नेता जैसे कई चरित्रों का पोस्टमार्टम किया गया है। विमर्श की दृष्टि से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, और बहुत से अन्य सभ्यतागत विमर्शों के साथ साथ मानव जीवन में घटित होने वाले बिडम्बनाओं का विश्लेषण किया गया है, जो कथित सभ्य समाज से अन्तर्गुम्भित हैं। कथा प्रारंभ होती है प्रवासीनाथ जी से जो एक चर्चित उपन्यासकार एवं विश्वविद्यालय के प्रवक्ता है ंतथा सुशीला और अमरेन्दर से, जो उनके निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं। प्रवासीनाथ सुशीला से नाटकीय ढंग से शारीरिक संबध बना लेते हैं, यही नहीं शारीरिक संबध बन जाने के बाद उन्हें लगता है कि सुशीला उनके प्रस्तावित उपन्यास की पाण्डुलिपि है। प्रवासीनाथ, सुशीला तथा अमरेन्दर के अलावा जो दूसरे चरित्र हैं उनमें एल.आर., कवि विलोचन, जगेशर, प्रधानाचार्या, बंगाली बाबू की बिटिया, जद्दो भाई, बाहुबली विधायक, सुशाीला के चाचा, सांसद तथा सुदर्शन जी आदि। इन्हीं चरित्रों के क्रियाकलापों के विवरणों व विश्लेषणों के द्वारा अन्तर्गाथा की औपन्यासिक जमीन तैयार की गई है। आई.ए.एस. के समकक्ष अधिकारी की बिटिया सुशीला इन्हीं चरित्रों के विभिन्न प्रसंगों पर केन्दित एक फिल्म भी बनाती है। वैसे प्रवासीनाथ के लिए पप्पू चाय के बैठकबाज चरित्रों का कोई मतलब नहीं होता पर सुशीला उहीं चरित्रों का मूल्य स्थापित करने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देती है जो उपन्यास के केन्द्रीय विषय बन जाते हैं। प्रवासीनाथ के लिए वामपंथ या उसकी अवधारणाएं उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना कि एल.आर. तथा जगेशर के लिए हैं। जबकि जगेशर तो प्रवासीनाथ की वामधारा की चेतना से ही प्रभावित होकर चारू मजूमदार के संगठन के साथ जुड़ा था पर उस रास्ते के अन्तर्विरोधों से दुखी होकर बनारस लौट आया था। यही हाल एल.आर. का भी था। वामउग्रवाद के अन्तर्विरोधों का शिकार होने के बाद उसने भी संगठन छोड़ दिया था। जगेशर ने बनारस में दूध बेचने का रोजगार डाल लेने के बाद खुद पान की गोमटी खोल लिया था पर एल.आर. बिना काम के था, खालीपन मिटाने के लिए वामपंथी धारा की एक पत्रिका निकालता था। वह कामरेडों को दो खानों में बांटता था, चुनाव लड़ने वालों को मठी कामरेड मानता तथा चुनाव का विरोध करने वालों को हठी कामरेड। चरित्रों की विभिन्नताओं के कारण पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों का जुड़ाव बना रहता है। प्रवासीनाथ की लेखकीय काम के बाबत अपनी प्रस्थापनायें हैं,..तरीके हैं ... ‘‘प्रवासीनाथ थे कि बिना सुरा सुन्दरी के न कुछ लिख पाते थे न किसी का कोई काम करा पाते थे। वे इसे लिखने का रोग मानते थे। सुरा, सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगों ने कुछ न लिखने की कसम खा रखी है, उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा।’’ अपने खास मित्रों से वे सगर्व कहते भी.. ‘‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संवेदनाओं से निरंतर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वाभाविक है’’ साहित्य जगत में प्रवासीनाथ का आतंक अमेरिकी तर्ज पर है, अपनी अपेक्षाओं की चीजों को हासिल कर लेना और दूसरों को देने के नाम पर ऑखें घुरेरना। उपन्यास में विभिन्न कथापात्रों के माध्यम से लेखकीय समाज की पड़ताल करते हुए राजनीतिक विचारधाराओं में व्याप्त विद्रूपताओं व बिडंबनाओं की समीक्षा अद्भुत हैं। अधिकांश पात्र एकल नहीं हैं, उनके साथ कोई न कोई महिला है..एल.आर. के साथ उसकी नर्स मित्र व बंगाली बाबू की बिटिया, कवि विलोचन के साथ एक कवियत्री, जद्दोभाई के साथ उनकी पत्नी हैं तो हनुमान भक्त पाण्डेय के साथ विदेशी लड़की, प्रवासीनाथ के साथ उनकी पत्नी पूसी हैं। प्रवासीनाथ तो प्रवासीनाथ हैं उनके साथ सुशीला भी जुड़ी हुई है। लहा, पटा कर किसी कवियत्री के कारण कवि विलोचन को कविसम्मेलनों में जहां केवल पांच सौ रुपये मिला करते थे तो महिला कवियत्री के साथ होने पर उन्हें पांच हजार मिलने लगे थे। प्रस्तुत उपन्यास वामपंथ में व्याप्त हताशा, निराशा और उसके कारण संगठन में उपजे भेदों, उपभेदों तथा विचारों में बदलते प्रतिमानों का आइना है। उपन्यास में एल.आर. एक ऐसा पात्र है जो वामपंथ त्याग कर समाजवादी हो जाता है, कारण होता है विश्वविद्यालय में होने वाले चुनाव के दौरान एक भाषण, उसे एक समाजवादी नेता संबोधित कर रहा था, एल.आर. कामरेडों के साथ उस नेता के लिए मंच के पास ही ‘गो बैक’, ‘गो बैक’ का नारा लगा रहा था..समाजवादी नेता ने सुन लिया कि कुछ कामरेड लड़के उसका विरोध कर रहे हैं, फिर तो उसने मंच से ललकारा... ‘‘कहां जाऊं गुरू? यहीं पैदा हुआ, यही पला, बढ़ा और पढ़ा लिखा। मेरी सभा का विरोध न करो, सभी को सुनना सीखो, रही लड़ने की बात तो एक एक करके आओ, फरिया लो।’’ फिर तो समाजवादी नेता मंच से डांक कर जमीन पर आ गया और एल.आर. को पकड़ लिया। समाजवादी नेता ने जांघिया छोड़ कर सारे कपड़े उतार दिये, एल.आर. सन्न और सुन्न.. समाजवादी नेता ने एल.आर. को जबरन मंच पर बिठा लिया और उसे आमंत्रित किया कि वह बोले.. विरोध बोल कर सामने करो, आड़े नहीं। इस घटना ने एल.आर. को बदल दिया और उसने सयुस की सदस्यता ले ली। उपन्यास की भाषा की बात करें तो पूरा उपन्यास काव्यमय है। एक तरफ प्रवासीनाथ हैं तो दूसरी तरफ उनका भाई ब्लाकप्रमुख है जो तीन दलितों को गोली मार देता है और बाद में तीन तिकड़म करके उसी पारटी के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बन जाता है। मुकदमे से प्रवासीनाथ प्रधानाचार्या से जुगाड़ लगा कर बरी हो जाते हैं. कथा कहन में बनारसी बोली का ठाठ अद्भुत है.. ‘‘थाने गये थे का गुरू? का हुआ?/ होगा क्या, सौ रुपये में सौदा पटा/महिनवारी/ हॉ बंबई जा रहे हो न?/नहीं, जाने का मन था पर अब नहीं जाऊंगा/ काहे?’’ कुछ वाक्य तो बहुत ही अर्थपूर्ण हैं..‘‘यार! यह धन पशु जद्दो भाई तो अन्तःमन से कामरेड है’/ ‘का गुरू कब से जेबा में गुड़ लेके चलय लगला?’ जेल और कचहरी तो मर्दों के लिए ही होती है’/‘हड़ताल, घेराव, प्रदर्शन तो पूंजीवाद के गुप्तांग हैं’’ बनारस में स्थित पप्पू चाय की दुकान की उपन्यास में केन्द्रीय भूमिका है। उपन्यास के सारे पात्र उस दुकान से गुंथे हुए हैं। वहां पर देश की संपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का पोस्टमार्टम होता रहता है, एक अजब तरह की अन्त हीन बहस, पर निर्णायक कभी नहीं। कभी तो देश में राजनीतिक रूप से वैसा ही होता जो पप्पू की दुकान में तय होता। दुकान में अमरेन्दर और सुशीला का प्रवासीनाथ द्वारा अपना उल्लू सीधा करने की बातें हों या बंगाली बाबू की बिटिया को लेकर बंबई भाग जाने की झूठी घटना हो जिस पर प्रवासीनाथ का संस्मरण छपा हो, सभी बातों को लेकर मुहल्ला गर्म हो जाता...उपन्यास में एक कथा चित्र है... ‘एक आदमी रिक्से पर कहीं जा रहा था, गंतव्य पर पहुचकर रिक्से से उतर गया, उसने रिक्से का किराया चुकता किया, रिक्से वाले को किराया कम लगा, उसने एतराज किया, बाकी किराया उसने मांगा। गोया झंझट बढ़ गई, रिक्से वाले ने सांस्कृतिक बयान दिया.. ‘गरीब हंू, मार लीजिए, कोई दूसरा होता तो मारते क्या? यात्री ने उसे दुबारा झापड़ मारा, उसने भी सांस्कृतिक बयान दिया...साले! पन्द्रह साल से कुबेर (धन के देवता) को खोज रहा हूं, मिल जाता नऽ , रामकसम पटक पटक कर उसे मारता.. पर मिलता ही नहीं, मिलते तो गरीब हैं फिर किसे मारूं? इसी आशय की कविता थी कवि विलोचन की, गरीब, दलित नहीं मारा जायेगा फिर कौन मारा जायेगा? इसका समाधान न तो जनतंत्र में है और न तो तानाशाही में...क्या ऐसी कोई हुकूमत नहीं जिसमें उसका समाधान हो? एक सवाल... जद्दो भाई व उनकी ठकुराइन की बातें देखें... ‘रहस्यमय ढंग से ठकुराइन टोंकती...अपने हिस्से का... ठकुराइन व्यंग्य रूपक गढ़तीं.. कहां से कैसे आपका हिस्सा? आप कहते हैं हमारे देश में गरीबी है... लोग खाये बिना मर रहे हैं... उस पर आप का हिस्सा, यह हिस्सा क्या है? जद्दो भाई बोलते... ‘‘यार ठकुराइन! तुम तो मार्क्स की बिटिया जैसी जान पड़ती हो, देखो, इस रूप को बनाये रखो, कहीं लेनिन या माओ का बेटा बन गई तो...यह तुम्हारा जद्दो आग में जल जायेगा।’’ नुक्कड़ नाटक के द्वारा हिन्दू मुस्लिम दंगा फैलाकर उसका चुनाव में चाहे राजनीतिक लाभ लेने की बात हो या इच्छाधारी प्रेत की बात हो जो सात समुन्दर पार एक सफेद महल में बसता हो इन कथाक्रमों को रूपकों के द्वारा समय की विसंगतियों पर प्रहार करने का तरीका रामनाथ शिवेन्द्र को एक अलग पहिचान देता है। दलित बस्ती जलाये जाने के विरोध में जद्दो भाई द्वारा किया जाने वाला प्रयास फिर उनकी गिरफ्तारी तथा उस विरोध के द्वारा पप्पू चाय की दुकान के बैठक बाजों को एक साथ जोड़ लेने का प्रसंग भी उपन्यास की गरिमा बढ़ाने वाला है। एल.आर.,जद्दो भाई तथा जगेशर के अनगढ़ चरित्रों का उपन्यास में बहुत ही आकर्षक संयोजन है, सुशीला की तरह। सुशीला है कि वह अपने लिए नहीं जीती, ऐसे चरित्रों को गढ़ने में उपन्यासकार की महारथ दिखती है। सुशीला अपने गुरुभाई अमरेन्दर के साथ बंबई चली जाती है, उसका मधुर जुड़ाव एक नामी फिल्मी गीतकार से है। वहां वह एक फिल्म बनाती है जिसकी चर्चा जोरों पर है खासकर बनारस में कि वह फिल्म बनारस के अस्सी पर स्थित पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों पर केन्द्रित है। अचानक एक दिन गीतकार को सुशीला पर सन्देह हो जाता है कि उसका संबध फिल्म के नौजवान प्रोड्यूसर से है, वह उसके कमरे में एक दिन देख भी लेता है। गीतकार तो गीतकार उसने आत्महत्या कर लिया। इसके बाद सुशीला के जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव आ जाता है। वह बंबई की सारी संपत्ति अमरेन्दर के नाम से स्थानांतरित करके बनारस चली आती है। बनारस यानि उसके गांव का पड़ोसी शहर। वह उसी गांव में बसने और सामाजिक काम करने का संकल्प ले लेती है जिस गांव का नाम तक उसके पिता के.नाथ कभी किसी को नहीं बताया करते थे। यहां तक कि वे अपने बड़े भाई का नाम भी किसी का नहीं बताते थे। उन्हें दलित कहलाये जाने का डर बना रहता था जबकि सुशीला दलित होने के हीनताबोध के डर से बाहर है। सुशीला अपने पिता का विलोम थी, संभव है बढ़ती दलित चेतना के कारण ऐसा हुआ हो। उपन्यास में दलित चेतना के उत्कर्ष के प्रभावकारी विवरण हैं तो जन संघर्ष के भी हैं। कुल मिला कर उपन्यास में अमरेन्दर तथा सुशीला के प्रेम की शुचितापूर्ण गाथा है तो प्रवासीनाथ के वैयक्तिक प्रतिभा के छद्म के उत्कर्ष का भी। सुशीला द्वारा अपना जीवन गांव के विकास के लिए समर्पित कर देना तथा अपनी जड़ों की तरफ लौटना किसी चुनौती की तरह है जैसा कि अमूमन नहीं हुआ करता। गांव में उसे दलित जन ही नहीं सवर्ण भी प्यार करने लगते हैं वह अपने गांव में स्कूल तथा अस्पताल खुलवाती है तथा गांव से बाहर पढ़ने वाले छात्रों को स्कालरशिप भी देती है। अपनी कार्ययोजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए वह जद्दो भाई, एल.आर. तथा बंगाली बाबू की बिटिया को भी जोड़ लेती है। उसके स्कूल के प्रबंधन को लेकर क्षेत्र के बाहुबली विधायक से भी उसे पंगा लेना पड़ता है। दरअसल बाहुबली नहीं चाहता कि सुशीला दलितों व सवर्णों को एक साथ जोड़ कर चले तथा विद्यालय चलाये। पर सुशीला तो सुशीला वह बाहुबली से पंगा ले ले लेती है। एक घटना के दौरान सुशीला के स्कूल के छात्र बाहुबली का विद्यालय परिसर में ही कुटम्मस कर देते हैं फिर तो पुलिस, सरकारी दमन। विधायक सत्ता पक्ष का होता है पर सुशीला उससे नहीं डरती, वह तनेन खड़ी है। प्रशासन विद्यालय बन्द करा देता है, परिसर में पुलिस का पहरा लग जाता है सुशीला इस दौरान एस.पी. से भी भिड़ जाती है। मुकदमे का अन्तहीन सिलसिला पर हाई कोर्ट का आदेश सुशीला के पक्ष में आ जाता है, विद्यालय फिर से शुरू हो जाता है। मरने जीने की परवाह किये बगैर सुशीला ने बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निश्चय किया। सुशीला द्वारा बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के बाद उपन्यास समाप्त हो जाता है। आगे क्या हो सकता है? इसका निर्णय पाठकों पर शिवेन्द्र जी छोड़ देते हैं। ऐसा करना उपन्यासकार की लेखकीय कुशलता है। पाठक भी तो सोचें... आशा है शिवेन्द्र जी का प्रस्तुत उपन्यास भाषा, शैली तथा कथा के प्रस्तुतीकरण की काव्यात्मकता प्रभावित करेगी उनके अन्य उपन्यासों की तरह। उपन्यास- अन्तर्गाथा 

रचनाकार- रामनाथ शिवेन्द्र 

 प्रकाशक- नेहा प्रकाशन, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. उलधनपुर, नवीन शाहदरा दिल्ली, 110032 प्रकाशित......कथाक्रम जनवरी-मार्च 2017 पृ...99-101

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