धरती कथा जमीन और संपत्ति के सवाल पर लिखा एक परिवर्तनकारी एवं लोक बोधी उपन्यास

 


 
 धरती कथा जमीन और संपत्ति के सवाल पर लिखा एक परिवर्तनकारी एवं लोक बोधी उपन्यास। आइए...... 

उपन्यास की भूमिका देखें-----

"आखिर कब तक बंद रहेंगे हम आधुनिकता तथा उत्तर आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में---"

किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने तथा न  बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिंदगी यों का नियामक भी है लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता। उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है इस खुली छूट के बाद भी अगर उपन्यास कुछ कर सकते तो प्रेमचंद जी के सारे पात्र आज गली गली गांव गांव रोते चीचीयाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ । इसीलिए आधुनिक तथा उत्तर आधुनिक उपन्यासों के केंद्र में वे अब नहीं है प्रेमचंद के उपन्यासों के नायक तो तबके हैं जब हम गुलाम थे आज हम गुलाम नहीं है। सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गए हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं किसी भी गली में किसी भी चौराहे पर ललकारते हुए की अरे भाई हमसे का मतलब। यह हमसे का मतलब कोई निरर्थक एक वाक्य या मुहावरा ही नहीं है यह तो बहुत ही गहरे अर्थबोध वाला है इसे खोलेंगे चाहे इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति समाज नीत अर्थनीति धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जाएगा तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे नायक हैं वे उपन्यासों से कविताओं से बाहर निकलकर सड़क पर खड़े हैं रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं चुनाव लड़ने के लिए परचे खरीद रहे हैं ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा ना होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उनके सामने ठीक उनके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है वह जो आदमी बिना कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है हमसे का मतलब।  वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा है और ना प्रतिरोध में कुछ कर रहा है वह हमसे का मतलब का मंत्र अपने मन में बिठाए तुलसीदास की चौपाई--- कोई हो नृप हमें का हानी का पाठ कर रहा है।

तो कहां जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी पाठ में तब्दील हो चुके हैं और हम से का मतलब का पाठ कर रहे हैं प्रस्तुत उपन्यास धरती कथा के पात्रों किसी पाठ में है की तब्दील हो चुके हैं किसी पात्र में ही नहीं इसकी घटनाएं भी पाठ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित है पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए फटकार रहा है अगर तुम घटना के साक्षी तो देखो और समझने की कोशिश करो की घटनाएं कैसे घटा करते हैं कैसे अपनाना नायकत्व सिरज लिया करती हैं। घटना के पात्र घटना का मुख्य किरदार होते हुए वी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर कहीं दूर बहुत दूर कूड़े की तरह फेकाये हुए हैं। उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन। और उसका घटना के घटित होने द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो घटित है वह घटना तो है ही घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत जरा गुनिये इस बाबत।

जरूरत तो नहीं है मैंने पूरा प्रयास किया इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक चुनूं पर ऐसा ना कर पाया घटनाएं जो खून आलूदा थी वह मुझे लगातार घसीटते रहीं कभी मुझे भाई की तरफ ले जाती तो कभी दाईं एज लं तरफ तो कभी आज के सत्ता बाजार और उसके कोतुको की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्यता कौतुक में जो फंस गया वह भी और जो रम गया वह भी से बाहर नहीं निकल सकता। धरती कथा का एक पात्र नायक की तमीज तमीज वाला सरवन था  वह करिश्मा जरूर करता है पर उसकी हत्या कर दी गई उसकी कथा के साथ दूसरे 9 जवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आस जगी थी कि बबुआ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नए किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जांच पड़ताल की मायाजाल में उलझ कर रह गया । वह साहस कर के पुलिसिया कार्रवाई के जाले को फलाने तथा अदालती  संस्कारों से निजात पाने से एक कदम भी आगे बढ़कर कथानक को कुलीन ना बना पाया हो कथानक  कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि अद्भुत होना उपन्यास के लिए जरूरी हुआ करता है।

तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथी अपनी संपूर्ण बौद्धिकता के साथ आलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गांव भी आपक

मिलेगा दो उपन्यास का केवल कथा ना कि नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंचकर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गांव आपको कैसा लगा आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।

राम नाथ शिवेंद्र mobile....7376900866

धरती कथा उपन्यास  

जरूरी सवाल तो  पूछे ही जाएंगे

वीरेन्द्र सारंग

वरिष्ठ कथाकार रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास धरती कथा काल्पनिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। शिवेंद्र सोनभद्र के हैं और भी वहां के समाज साहित्य से पूरी तरह परिचित है। वे राजनीति में दखल नहीं रखते लेकिन उसमें भी उनकी समझ सार्थक रूप से देखने को मिलती है। धरती कथा उपन्यास की कथा जिस घटना पर आधारित है वह दिल दहलाने वाली है। आज के लोकतंत्र में ऐसा नरसंहार जो जमीन से बेदखल करने के लिए किया जाए कई सवाल खड़ा करता है। इतना ही नहीं नरसहार बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से किया गया है। 10 लोगों की हत्या कोई मामूली घटना नहीं है। वे 10 लोग कौन हैं? हां वे वही लोग हैं जो अपने उर्वर भूमि पर खेती करते हैं आज से नहीं बाप दादा के समय से। उन्हें पता ही नहीं कि वह जमीन तो किसी और की है। ऐसी स्थिति में विवाद होना तो तय है। उस नरसंहार की चर्चा पूरे भारत में विस्तारित हुई। घटना कहीं और की नहीं सोनभद्र जिले के किसी गांव की है। या वही जिला है जहां आदिवासी और छोटे किसान रहते हैं।

उपन्यास में जिस गांव की घटना है वह गांव काल्पनिक है बल्कि 100 फ़ीसदी सही है। हल्दीघाटी गांव जंगल के बिल्कुल पास है और जिस भूमि पर विवाद है उस पर मुकदमा भी चल रहा है लेकिन कोई समाधान नहीं। आखिर हमारे किसान कब तक अदालत के चक्कर में अपना पेट काटते रहेंगे जमीन से बेदखल होने के डर से मानसिक पीड़ा झेलते रहेंगे । सोनभद्र जनपद को बतोर लेखक पड़ताल करें तो पता चलेगा की पूरे जनपद में विस्थापन का दर्द पसरा हुआ है वह भी एक कारण है उत्पीड़न और यातना का। चारों ओर गरीबी पसरी हुई है धरती कथा की कथा जमीन के अधिकार से शुरू होती है और वहीं पर खत्म भी हो जाती है आखिरकार जमीन का मालिक कौन है? और उस पर अधिकार किसका है? सवाल तो वैसे का वैसे ही और फिर नरसंहार उनका जो भोले-भाले किसान हैं जो खेत को उर्वर बनाते हैं अनाज उत्पादित करते हैं। लगता ही नहीं कि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं ऐसा जान पड़ता है यह किसी राजतंत्र द्वारा हम किसान लोग कुचले गए हैं तभी तो खेतों में निर्दोष लोगों की इतनी लाशें अपने सवालों के साथ पसरी पड़ी है जो आज की सत्ता व्यवस्था पर हमें मुंह चिढाती हैं और कहती हैं कि लोकतंत्र में क्या किसान सिर्फ मरने के लिए बैठा होता है?

रामनाथ शिवेंद्र का या उपन्यास घटना को बखूबी समझता है और पूरी पड़ताल भी करता है। किसानों की भूमि किससे और कैसे कई हाथों में बिकते बिकते ऐसी जगह पहुंच जाती है जो दबंग है और जो छोटे किसानों को बेदखल करने के लिए बंदूके चलाता है मानो कोई किला फतह करने की योजना बनाई गई हो। ऐसा भी नहीं की आदिवासी किसान प्रतिरोध नहीं करते गोली के आगे हाथ का क्या विरोध? चीखना चिल्लाना क्या गोली से लड़ पाएगा ? अब जो मारे गए हैं उस पर राजनीति भी होगी। क्या यही लोकतंत्र है?

विपक्ष की एक नेत्री आती है संवेदना व्यक्त करते हुए सवाल खड़े करती है लेकिन सत्ता में बैठे लोग क्या कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि कोई घटना बिना वजह क्यों घट जाती है? और जब घटना घट जाती है तब सरकार को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग जाता है उसके पहले तमाम ऐसे मुकदमे जो वर्षों से तारीखें झेल  रहे हैं लेकिन उधर किसी का ध्यान नहीं है। हर घटना के बाद योजनाएं बनेंगी, खडन्जे बिछे्गे मकान पक्का हो जाएगा और धीरे-धीरे सब ठीक-ठाक। फिर तब जमीन को नए ढंग से बंदोबस्ती का आदेश भी दिया जाएगा लेकिन कौन जानता है की यहां भी खेल होता है जो आदिवासी मारे गए जिन्होंने उस जमीन को उर्वर बनाया वह जमीन उन्हें नहीं मिलती उर्वर भूमि को उसे दे दी जाती है जो अधिकारियों को संतुष्ट करता है

आदिवासी चुप नहीं बैठते वे उसके लिए भी आंदोलन करते हैं और  पुलिस प्रशासन द्वारा मारे पीटे जाते हैं। किसान सवालों के ढेर पर खड़ा होकर सवाल करता है की लो काट लो मेरा पेट जितना भी चाहो, वह मुंह चिढ़ाता है सत्ता में बैठे लोगों या बड़े अधिकारियों को। आज भी किसान अपने अधिकार की लड़ाई पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ रहा है आखिर कब तक?

उपन्यास इस सवाल पर भी रोशनी डालता है कि समस्याएं कब हल होंगी? किसान केवल सोनभद्र का ही नहीं पूरे देश का है वैसे सोनभद्र में लगभग 70 फ़ीसदी मुकदमें भूमि विवाद के ही हैं। क्या जमीन सिर्फ तारीखे देखने के लिए उर्वर बनी है? यह कोई छोटी बात नहीं है। मुकदमे की तारीखें पूरे देश की समस्या है। आखिर हमें लोकतंत्र में समानता क्यों नहीं मिलती सवाल तो पूछे ही जाएंगे जो जरूरी होंगे। उपन्यास के पात्र सोनभद्र के धरती से जुड़े हुए लगते हैं और भाषा भी सोनभद्र की कुल मिलाकर धरती कथा की कथा जरूरी लगती है। यह उपन्यास बाकायदा पढ़ा जाना चाहिए इसलिए भी अति पिछड़े आदिवासी क्षेत्र सोनभद्र के कथाकार रामनाथ शिवेंद्र की दृष्टि व्यापक है।

मनीष पब्लिकेशन

४७१/१० एक ब्लाक पार्ट-२

सोनिया बिहार, नई दिल्ली-११००९०





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