वाम उग्रवाद के अन्तरविरोधों पर केन्द्रित उपन्यास ‘जंगल दंश’
वाम उग्रवाद के अन्तरविरोधों पर केन्द्रित उपन्यास ‘जंगल दंश’
यह आख्यान नहीं, कथा है, आइए देखते हैं, कथा के अलावा और क्या है?
‘जंगलदंश’ उपन्यास के बारे में कुछ कहने से अच्छा है, कुछ न कहा जाये तथा यह भी न बताया जाये कि जंगलदंश उपन्यास है या लम्बी कहानी है। पर इतना कहना जरूरी है कि आज के आलोचनात्मक व विखंडनवादी समय में, जहां कदम कदम पर कुदरती चिंतन तथ व्यवहार को ठेंगा दिखाया जा रहा हो, मानवीय समीपताओं को किसी भी तरह से नष्ट करने व मिटा देने के कूट प्रयास किये जा रहे हों, कृत्रिम संप्रभुताओं के द्वारा व्यक्ति की नैसर्गिक संप्रभुता को दमित व उत्पीड़ित किया जा रहा हो, जहां आदमी को आदमी की तरह जीने, मरने की कुदरती परिस्थितियां न उपलब्ध कराकर उसे उपभोक्ता वस्तु में तब्दील किया जा रहा हो, जहां चित्त, चेतना तथा चिंतन के हसीन बाजार हों और उस बाजार में विचार व दृष्टि को ( प्कमं ंदक अपेपवद ) बेचे तथा खरीदे जाने के कौशल दिखाये जार हे हों, ऐसे में ‘जंगलदंश’ की कुदरती कथा लिखना जरूरी था। ऐसे खतरनाक समय में कथा के माध्यम से यह देखना भी जरूरी था कि यह जो ‘जंगल में मंगल’ या ‘अहा ग्राम्य जीवन’ की राग अलापने, किसानों को फसल की दुगनी आय दिला कर उनकी आत्महत्या रोकने वाली साहित्यिक व खासतौर से राजनीतिक व्यवहारलिपि है, उसमें इन दोनों ‘पदों’ का कितना मान, सम्मान व आदर है?
किसे नहीं पता कि जंगल में जंग है तो गॉव में जाति है, गोत्रा है, अगड़ा है, पिछड़ा है, मंडल है कमंडल है, इनके अपने अपने दांव हैं पर ‘अहा ग्राम्य जीवन’ तथा ‘मंगल’ कहीं नहीं है। हर तरफ जंग ही जंग हैं, दांव ही दांव हैं। जंगल में जंग हैं तो गॉव में दांव हैं। जंगल हैं, तो कारखानों के द्वारा उपजाये गये विस्थापन के दंश हैं, गॉव हैं तो जमीन है, जमीन है तो उसके होने न होने के कारण हैं, मालिकाना है, विरासत है, वसीयत है और कब्जे हैं तथा जब ये सब हैं तो थाना है, कचहरी है यानि बहुत कुछ है। जमीन, जोरू और जर(संपत्ति) का सीधा मतलब है झगड़ा, झगड़ा है तो थाना है कचहरी है, मुकदमा है। बाहरी दुनिया यानि
प्रशासकों की दुनिया में विवेकाधिकार तथा विशेषधिकार हैं। गोया हर समाज बटा हुआ है चाहे नागर हो या ग्रामीण उसी के अनुसार मानवनिर्मित अधिकार भी विभाजित हैं समझना यही है कि ये विभाजन समतावादी समाज के अनुकूल हैं या समाज को पन्द्रहवी शताब्दी में ले जाने वाले हैं। अगर ऐसा ही है फिर हमारी सभ्यता किन अर्थों में आधुनिक है?
जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ता प्रबंधन के लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है?
वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डंस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भल मानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान होगा भी कैसे, बाजार में तो किसी कार्टून की तरह इधर से उधर उड़ते रहना मजबूरी है।जंगलदंश की कथा आपके सामने है, देखिए यह कथा आपको प्रभावित कर पाती है या नहीं। अगर इस कथा के माध्यम से आप वामउग्रवाद के क,ख,ग, से वकिफ हो जाते हैं फिर तो यह सार्थक कथा होगी।
हिन्सा तथा अहिन्सा दो छोर हैं वामउग्रवाद को समझने के लिए। कम से कम भारतीय संस्कृति किसी भी हाल में हिन्सा की वकालत नहीं करती। वामउग्रवादी चिन्तन भारतीय व्यवहार संस्कृति की भाषा नहीं है। समाज बदल के लिए हिन्सा का सहारा लेना यह पद्धति भारत में मनोवैज्ञानिक व सामाजिक रूप से त्याज्य है, इस पद्धति में सामाजिकता तो हो ही नहीं सकती। आज के समय को सोलहवीं शदी में बदल देना या बदलने का प्रयास करना सिवाय बेवकूफी के और कुछ नहीं।
आशा है मेरे पिछले उपन्यासों की तरह प्रस्तुत उपन्यास को भी आपकी मुहब्बत मिलेगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में...कृ
भावना प्रकाशन, 109-पटपड़गंज गॉव, दिल्ली-110091
मो... 8800139684, 9312869947, प्रथम संस्करण 2022,
मूल्य...400.00 रु.


Comments
Post a Comment